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कोहिनूर, एक नायाब हीरा या फिर एक अभिशाप : जानिए पूरा रहस्य

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Sehat Sundar : Azab Gazb Duniya

























 कोहिनूर हीरा, इसे फारसी में कोह-ए-नूर कहा जाता है। कोहिनूर का साधारण अर्थ है - चमचमाती रोशनी का पहाड़। जी हाँ, इस हीरे की चमक काफी नायाब है। यह पूरे विश्व में सबसे प्रख्यात हीरा है। आपको यह जानकार हैरानी होगी कि इस हीरे की कीमत इतनी है जिसमे लगभग हमारी आधी दुनिया समा जाएगी। यह हीरा 105 कैरेट का है और अपने इतिहास में यह हीरा कभी नहीं बिक पाया।


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यह हमारे भारत की भूमि से जन्म एक ऐसा रत्न है जिसकी खूबसूरती और सौंदर्य की पूरी दुनिया में चर्चा है। लेकिन इतने बहुचर्चित हीरे को बहुत से विद्वान एक अभिशाप के रूप में देखते हैं। इस पूरे लेख को पढ़ने के बाद आप खुद ही तय करने में सक्षम हो जाएंगे कि क्या कोहिनूर सच में एक नायाब हीरा है या फिर यह एक सुनहरा अभिशाप है। 

दरअसल, कोहिनूर की कहानी आरंभ होती है आज से लगभग 5000 सालों पहले। इस हीरे का सफर आन्ध्रप्रदेश राज्य के गोलकुंडा से शुरू हुआ। दरियाई-नूर और नूर-उन-ऐन जैसे विश्व प्रसिद्ध हीरे उगलने वाला यह खदान एक बार फिर से दुनिया को चौकाने वाला हीरा सामने लेकर आया। ऐसा कहा जाता है कि गोलकुंडा के कोयले की खदान में काम करते समय वहाँ के मजदूरों के हाथ एक बेशकीमती पत्थर लगा। यह हीरा कोयले के नीचे दफन था। जब इस हीरे को बाहर निकाला गया तो इसकी चमक से पूरा का पूरा खदान जगमगा उठा। उसके बाद इस हीरे को इस खदान से कैसे निकाला गया इसके बारे में पूरी जानकारी किसी के पास नहीं है। लेकिन यह अनुमान लगाया जाता है कि इस हीरे को खदान से लगभग सन 1100 ई० में निकाला गया होगा।

जब कोहिनूर गोलकुंडा की खदान से बाहर निकाला गया था तो उस समय उसका आकार मुर्गी के अंडे के समान था। इसके बाद यह हीरा कहाँ था इसके बारे में कोई पुख्ता जानकारी इतिहास के पास भी नहीं है। इतिहास में इस हीरे का जिक्र सबसे पहले सन 1924 में हुआ है। बाबर के लिखे बबरनामा के अनुसार यह हीरा उस समय मालवा के किसी राजा के पास था। इसके बाद काकतीय राजवंश ने इस हीरे को जीत कर अपने पास रख लिया। इस हीरे के आने के बाद इस वंश का विनाश आरंभ हो गया। जिस राजवंश ने लगभग 250 वर्षों तक शासन किया था वह केवल 17 सालों में समूल नष्ट हो गया। सन 1323 में काकतीय शासक राजा प्रताप रुद्र पर दिल्ली सल्तनत के सुल्तान गायसुद्दीन तुगलक के बेटे ने आक्रमण किया और काकतीय राजवंश का पूरा निशान मिटा दिया। इस तरह यह हीरा गोलकुंडा से निकालने के बाद मालवा पहुंचा और मालवा से दिल्ली। काकतीय वंश के खत्म होने के बाद यह हीरा 1325 से 1351 ई० तक मुहम्मद बिन तुगलक के पास रहा और 16वीं शताब्दी के मध्य तक यह तुर्क सुल्तानों के पास दिल्ली में ही रहा। इसके बाद तुगलक वंश का अचानक समूल नाश हुआ सन 1526 ई० में, जब बाबर ने पानीपत के मैदान में उनकी सल्तनत को मलिया-मेट कर दिया।

इसके बाद यह हीरा मुगल वंश की शान बना रहा। जिस बाबर ने अपने बबरनामे में इस कोहिनूर का प्रथम जिक्र किया गया था उसी का बेटा हुमायूँ इसका अगला शिकार बन गया। हुमायूँ शेरशाह सूरी के हाथों बुरी तरह पराजित हुआ। इसके बाद शेरशार सूरी भी नहीं बचा बल्कि उसकी भी मृत्यु काफी दर्दनाक हुई। वह एक तोप के सामने आ गया और वहीं जिंदा झुलस गया। इसके बाद उसका पुत्र जलाल खाँ उसका उत्तराधिकारी बना। जलाल खाँ भी अपने साले के हाथ मारा गया और उसके साले का कत्ल खुद के मंत्री ने कर दिया। वह मंत्री भी एक युद्ध को जीतते जीतते आंख में चोट लग जाने के कारण हार गया और स्ल्तनत खो बैठा।


हुमायुं के बेटे अकबर ने इस हीरे को कभी अपने पास नहीं रखा। लेकिन अकबर के पोते को इसकी खूबसूरती भा गई। ऐसा माना जाता है कि शाहजहाँ अपनी बेगम मुमताज़ से जितना प्यार करता था उतना ही प्यार वह इस हीरे से भी करता था। उसने अपनी बेगम की याद में ताजमहल का निर्माण करवाया और खुद के लिए वह ताजमहल के बगल में काला ताजमहल बनवाना चाहता था। लेकिन तब तक इस हीरे ने अपना असर दिखा दिया। औरंगजेब ने शाहजहाँ को बंदी बना लिया और कारागार में भूखे-प्यासे शाहजहाँ ने अपने प्राण त्याग दिए। इतना ही नहीं औरंगजेब ने अपने बाकी के तीन भाइयों को भी मौत के घाट के उतार दिया।

शाहजहाँ ने इस हीरे को अपने मयूर सिंहासन पर जड़वा दिया था। इस सिंहासन पर बैठने वाला अंतिम सम्राट मुहम्मद शाह रंगीला था। उसे नादिरशाह ने बुरी तरह परास्त किया और हीरा अपने साथ ले गया। हीरे की चमक को देखकर उसके मुँह से एक शब्द निकला, कोह-ए-नूर और तभी से इस हीरे का नाम कोहिनूर पड़ गया। लेकिन यह हीरा केवल भारत के राजाओं और सुल्तानों के लिए ही घातक नहीं रह बल्कि भारत के बाहर पर्सिया में भी इसने अपना कमाल दिखाया। हीरा लेकर आने के 8 सालों के बाद उसकी हत्या कर दी गई। इसके बाद नादिरशाह के वंशज कोहिनूर को लेकर अफगानिस्तान भाग गए। ईरान ने अफगानिस्तान पर हमला किया पर लाहौर के राजा रणजीत सिंह ने अफगानिस्तान की रक्षा की और वहाँ उसे यह हीरा तोहफे के रूप में मिला।

इस तरह यह हीरा फिर से एक बार भारत आ गया। हीरे को लेने के कुछ सालों के भीतर राजा रणजीत सिंह भी खत्म हो गए। उनके 9 साल के बेटे दिलीप सिंह, अंग्रेजों की साजिश का शिकार हो गए। लॉर्ड डलहौजी ने लाहौर को अँग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया। इसके बाद महारानी विक्टोरिया के सामने इसे पेश किया गया। इसके बाद यह हीरा ब्रिटिश साम्राज्य के तख्त पर चढ़ गया।

अभिशाप की यह कहानी ब्रिटिश शासन तक भी पहुंची। जिस ब्रिटिश साम्राज्य को विश्व का सबसे बेहतर साम्राज्य माना जाता है और जिस ब्रिटेन को दुनिया का सुपर पावर माना जाता था वह भी इसकी चपेट में आ गया। विश्व युद्ध में ब्रिटिश साम्राज्य अस्त-व्यस्त हो गया और सुपर पावर का खीताब उसके हाथों से फिसलकर अमेरिका के हाथ चला गया।

एक प्राचीन ग्रंथ में भी इस हीरे के अभिशाप की बात लिखी हुई है और वहाँ इस बात का वर्णन किया गया है कि अगर इस हीरे को कोई पुरुष धरण करता है तो उसका समूल विनाश हो जाएगा। यह हीरा या तो ईश्वर धारण कर सकते हैं या फिर कोई स्त्री। इसी कारण ब्रिटेन में अब इस हीरे से जड़ित ताज को केवल महारानियों के पहनने इजाजत है। पुरुषों के पहनने पर पाबंदी लगी हुई है।


इस तरह यह कोहिनूर हीरा गोलकुंडा से निकल कर मालवा, दिल्ली, पर्सिया, अफगानिस्तान, लाहौर होते हुए इंग्लैंड पहुंचा और जहाँ-जहाँ यह गया, तबाही साथ लेता गया। अपने पूरे इतिहास में कोहिनूर हीरा एक बार भी नहीं बीका। लेकिन इसने न जाने कितने राजाओं को नचाया। इस हीरे के पीछे की कहानी आपलोगों के सामने आ चुकी है। अब यह आपके ऊपर है कि आप इस अनोखे हीरे को दुनिया का नायाब हीरा माने या फिर एक अभिशाप।

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